आदिम जनजाति
कमार के विकास
में शासकीय विकास
योजनाओं की भूमिका (गरियाबंद
जिला के छुरा विकासखण्ड
के विशेष संदर्भ
में)
Dr. Nister Kujur
Senior Assistant
Professor, School of Studies in Sociology,
Pt. Ravishankar
University, Raipur (C.G.) – 492010
*Corresponding Author E-mail: nister.kujur@yahoo.com
भारत
देश में कुल आवादी
का लगभग 8.2 प्रतिशत
जनसंख्या जनजातियों
का है और जनजातियों
की करीब 500 से भी
अधिक उप-समूहों
में विभक्त है।
जनजातियों की इन
समूहों में 75 आदिम
जनजातियां है जो
देश के दुर्गम
पहाडी और पठारी
भोगों में निवास
करती है । यह समुदाय
वर्षो से अस्तित्व
को बनाए रखने एवं
आजीविाका के लिए
संघर्ष कर रही
है तथा कई समस्याओं
से वह आज भी ग्रस्त
है । देश के दुर्गम
क्षेत्रों में
निवास करने वाली
जनजातियों और आदिम
जनजातियों के विकास
के लिए सरकार द्वारा
पिछडी जपजातियों
का पहचान कर आदिम
जनजाति के रूप
में मान्यता प्रदान
की गयी तथा 70-80 के दशक
में जिला स्तर
पर पृथक अभिकरण
स्थापित करके इनके
विकास के प्रयास
लगातार की जाती
रही है । सरकार
के इस प्रयास में
रोजगार, भूमि सुधार, उन्नत बीज
वितरण,
खाद, कीटनाशक, सिंचाई पम्प, तलाब, डेम, बकारी पालन, मुर्गी पालन, मच्छली पालन, मधुमखी पालन, स्वच्छ पेयजल, स्वाथ्य, आवास, मच्छरदानी, सौर उुर्जा, आश्रम शाला, छात्रवृत्ति, कंबल वितरण, कई योजनाओं
एवं कार्यक्रमों
का क्रियान्वयन
किया गया है। किन्तु
यह समुदाय कुछ
छूटपुट परिवर्तन
को छोडकर इनमें
डायरिया, उल्टी दस्त, पगडडी रास्ते
से ग्रामीण बाजार
आत व जातेे , घर में चटाई
में लेटा हुआ रोगी, दूर से झरना
या डबरी से पीने
की पानी लाती हुई
महिला,
धूल
से सना हुआ 2-5 वर्ष
का बच्चा असानी
से देखा जा सकता
है, अर्थात यह
समुदाय आज भी आवागमन
के बारह मासी सडक
मार्ग से दूर, निम्न स्वास्थ्य
स्तर, शिक्षा का
निम्न स्तर, आवास के
नाम पर झोपडी, स्वच्छ पेयजल, बिजली, बेरोजगारी, इत्यादि
आधाभूत समस्याओं
से जुझ रही है ।
इन्हीं
आदिम जनजातियों
में एक अध्ययनगत
जनजाति कमार है
जो आज बाहरी समाज
से एक कटा हुआ है।
प्र्रस्तुत शोध-पत्र
में कमार जनजाति
लोगों में शासकीय
विकास योजनाओं
के प्रभाव को ज्ञात
करने का प्रयास
किया गया है।
कमार
जनजाति संक्षिप्त
परिचय:
आदिम
जनजाति कमार देश
की विशेष पिछड़ी
जनजातियों में
से एक है। मोहन्ती
(इनसाइक्लोपीडिया
आॅफ प्रीमिटिव
टाईब्स इन इण्डिया, 2004, पृ. 227-228) ने अपने अध्ययन
में कमार जनजाति
को द्रवीड़ियन जनजातीय
समूह का एक छोटा
समूह कहा है और
रायपुर जिला के
सीमावर्ती राज्यों
को इनका निवास
क्षेत्र बतलाया
है। कमार जनजाति
अपनी उत्पत्ति
मैनपुर विकासखण्ड
के देवडोंगर ग्राम
से बताते है, उनका बड़ा
देव आज भी देवडोंगर
की वामन डोंगरी
में स्थापित है
। रिजले (द प्यूपल
आॅफ इण्डियाः 1908) ने अपने अध्ययन
में इनमें कई गोत्र
समूह में बंटे
होने का उल्लेख
किया है, जिसमें कश्यप, सडीलया (बिहार), अलबायना, भारद्वाज, कश्यप, मोउडगुलया, सांडील्य
(पं. बंगाल) इत्यादि
प्रमुख है, जबकि प्रस्तुत
अध्ययन में 05 गोत्र
समूह पाया गया
है, जिसमें नेताम, मरई, निरई, सोरी एवं
सोढ़ी प्रमुख है।
अध्ययन
का उद्देश्य:
प्रस्तुत
शोध अध्ययन आदिम
जनजाति कमार के
विकास में शासकीय
विकास योजनाओं
की भूमिका को ज्ञात
करने का प्रयास
किया है। शोध अध्ययन
में आदिम जनजाति
कमार इसके प्रभाव
से कहां तक प्रभावित
हुई है ?
ज्ञात
करने का प्रयास
किया गया है।
अध्ययन
पद्धति:
छत्तीसगढ़
राज्य में कमार
जनजरति की वर्श
2001 की जनगणना
अनुसार कुल जनसंख्या
23113 जो 5485 परिवार
के रूप में निवास
करती है। गरियाबंद
लिजा में इनकी
परिवार की कुल
संख्या 2344 है। जिसमें
अध्ययनगत विकासखण्ड
में 450 कमार
परिवार निवास करती
है तथा इनकी कुल
जनसंख्या वर्श
2011 के जनगणना
अनुसार 2,75,380 है । अध्ययन
हेतु 08 ग्राम
का चुनाव किया
गया जिसमें खट््टी, पिपरछेडी, कोशामपा, गायडबरी, देवगांव, धामनडीह, कमसाटोला
एवं कटेलपारा प्रमुख
है, चयनित गांव
में कुल कमार परिवार
की संख्या 332 है जिसमें
39.2 प्रतिशत
परिवार को अध्ययन
इकाई के रूप में
चयन किया गया है
।
चयनित
परिवार के मुखिया
से साक्षात्कार
अनुसूची के द्वारा
तथ्यों को संकलन
किया गया है।
कमार
परिवार परिवारिक
पृृश्ठभुमि:
कमार
जनजाति जैसा की
स्पश्ट है देश
की आदिम जनजाति
में एक है यह जनजाति
में प्रारंभ से
ही पारिवारिक आवश्यकताओ
की पूर्ति नहीं
कर पाने की समस्या, पारिवारिक
सदस्यो की संख्या
अधिक होना, शिक्षा का
निम्न स्तर, स्वास्थ्य
के लिए झाड-फूक
व परम्परागत साधनों
पर निर्भर, रोजगार के
नाम पर वनोपज संग्रहण, कंदमूल व
मानसून पर आधारित
परम्परागत कृृशि
कार्य,
मजदूरी
उद्वेश्य विहीन
जीवन शैली, सीमित आवश्यकताऐं
इत्यादि इनकी विशेशताऐ
रही है। पल्टा
एवं सहयोगी (1995) ने कमार जनजाति
के अध्ययन में
पाया की 48.95 प्रतिशत
परिवार कच्चा मकान
में निवास करता
था तथा कुजूर (2011) ने आदिम जानजाति
कोरवा के अध्ययन
में उन्होंने
पाया की 68.8 प्रतिशत
कोरवा परिवार कच्चा
मकान तथा 3.7 प्रतिशत
परिवार झोपड़ी में
निवास करता था।
रंजन एवं कुमार
(2012) ने अपने मुण्डा
जनजाति के अध्ययन
में पाया की न्यूनतम
3.37 प्रतिशत
उत्तरदाता स्थायी
नौकरी करते है।
शोध अध्ययन में
उत्तरदाताओं के
परिवार का आकार, शिक्षा का
स्तर, व्यवसाय
एवं मासिक आय को
ज्ञात करने का
प्रयास किया गया
है।
11 परिवार
के स्वयं का आवास
नहीं है दूसरो
के घरों में निवास
कर रहा है। जिनके
पास स्वयं का अवास
है उनमें 26.9 प्रतिशत
परिवार इंदिरा
अवास योजना अन्तर्गत
पक्का मकान प्रदाय
की गई है । परिवार
के सदस्यों में
36.9 प्रतिशत
परिवार में 7 से अधिक परिवाररिक
सदस्य है जो कमार
परिवार को कई दृृश्टि
से प्रभावित करता
है क्योंकि सरकार
के अधिकांश योजनाओं
में लाभ पहुंचाने
के लिए परिवार
को एक इकाई माना
जाता है, परिवार में
जितना कम संख्या
होगा उतना ही योजना
प्रभावी होती है।
90.9 प्रतिशत
उत्तरदाता केवल
पूर्व माध्यमिक
स्तर एवं इससे
कम स्तर की शिक्षा
प्राप्त की है।
इसका तात्पर्य
यह है कि कमार लोगों
में नहीं के बराबर
लोग हाईस्कूल एवं
हायर सेकण्डरी
स्तर की शिक्षा
प्राप्त की है
जो इनमें शिक्षा
का निम्न स्तर
होने को दर्शाती
है। इसी तरह केवल
30 प्रतिशत
उत्तरदाता का व्यवयाय
कृृशि है जबकि
शेष उत्तरदाताओं
जीविका का साधन
परम्परागत है।
परिवार के मासिक
आय में न्यूनतम
18.4 प्रतिशत
परिवार का वार्शिक
आय लगभग 42-48 हजार
रूपये है । इस तथ्य
का सत्यापन व्यास
;कृृशि
और आदिवासी 2006द्ध जिसमें
उन्होंने इनके
आर्थिक तंगी का
कारण जंगली पर्वतों
से घिरे होने, ढलाउ, पथरीली भूमि
और सिंचाई साधनों
का अभाव होने को
प्रमुख कारण माना
है जो कमार जानजाति
पर भी लागू होती
है।
उत्तरदाताओं
के परिवार में
आवश्यक भौतिक सुविधायें:
वर्तमान
में जनजाति परिवार
नगरीय समाज के
कई भौतिक संशाधनों
के उपयोग करने
की दौड में सुमार
है तथ परिवर्तन
ग्रामीण परिवार
में दिखायी पडते
है। द्विवेदी
एवं सहयोग (2006)6 ने मिर्जापुर, सोनभद्र
मण्डल के लाख की
खेती करने वाले
जनजाति परिवार
के अपने अध्ययन
में पाया कि लाख
उत्पादन करके जनजाति
न केवल जीविका
कर रहे है, बल्कि अतिरिक्त
धर्नाजन कर आधुनिकता
की दौड़ में शामिल
हो गये है तथा जीवन
के कई भौतिक संशाधनों
का उपयोग कर रहे
है। शोध अध्ययन
में कमार जनजाति
के परिवार में
आवश्यक सुविधाओं
को ज्ञात करने
का प्रयास किया
गया है।
कमार
परिवार में घरेलू
उपयोग के भौतिक
सुविधाऐं संबंधी
उपरोक्त तालिका
से ज्ञात होता
है कि लगभग सभी
परिवार में दैनिक
उपयोग के बर्तन
उपलब्धता है, फाईबर कुर्सी
केवल 22 प्रतिशत
परिवार और टेबल
4.6 प्रतिशत
परिवार में, टेलीविजन
9 परिवार
में, साईकिल आधे
से कम परिवार में, मोटर बाईक
04 परिवार
में, मोबाईल 17 परिवार
में तथा विद्युत
की सुविधा अधिंकाश
परिवार में उपलब्ध
है ।
कमार
परिवार में उपरोक्त
तथ्यों के संबध
में यह देखा गया
कि टेलीविजन, मोटर बाईक, मोबाईल उन
परिवार में पाया
गया जिनके परिवार
के सदस्य नौकरी
अथवा सरपंच जैसे
पदों पर कार्य
कर रहे है, साथ ही इनमें
आधुनिक भौतिक संशाधनों
के उपयोग करने
के प्रति जागरूकता
के स्तर में परिवर्तन
हुए है।
कमार
परिवार में शासकीय
योजनाओं के लाभ
का स्तर-
मेनन, जनजाति विकास:
नीतियां, योजनाएं
और कार्यक्रम, 2004 ने अपने
अध्ययन में संवैधानिक
प्रावधान को निर्देश
मात्र नहीं बल्कि
इसके जरिए ठोस
नतीजे को हासिल
करने का पुख्ता
प्रबंध बतलाया
है, यही कारण
है कि भारत में
जनजाति विकास के
प्रयास प्रथम पंचवशीय
से ही प्रारम्भ
की गई किन्तु कमार
जनजाति के विकास
के वास्तविक प्रयास
70-80 के दशक
में विशेष पिछडी
जनजाति के रूप
में पहचान होने
के पश्चात्् ही
इनके विकास के
एक नई अध्याय प्रारंभ
हुई जिसमें इनके
विकास के लिए पृृथक
अभिकरण स्थापित
किए गए और कई योजनाओ
एवं कार्यक्रमों
को क्रियान्वित
किया गया है। शोध
अध्ययन में उत्तरदाताओं
के परिवार को शासकीय
योजनाओं का लाभ
कहां मिली है जानने
का प्रयास किया
गया है जो नीचे
तालिका में दर्शाया
गया है।
शासकीय
योजनाओं के लाभ
संबंधी उपरोक्त
तालिका से ज्ञात
होता है कि कुल
परिवार में से
केवल 34 परिवार
को अवास योजना
का, इसी तरह शि़क्षा
योजनाओं का 44 परिवार, 51 परिवार
को स्वास्थ्य योजना
का, 37 परिवार
को भूमि सूधार
योजना का, 88 परिवार को
पशु पालन योजना
का और केवल 17 परिवार
को वन भूमि पट्टा
योजना का लाभ मिला
है। उपरोक्त योजनाओं
में सर्वाधिक लाभ
का दर पशु पालन
योजना है किन्तु
इस योजना के अन्तर्गत
बकरी प्रदाय किया
गया जिसमें प्रत्येक
हितग्राही को केवल
01 नग बकरी
दिया गया था जिससे
परिवार के आर्थिक
स्थिति को किसी
तरह का प्रभावित
करने में योजना
विफल रहा है। साथ
ही दूसरे योजनाओं
की स्थिति लगभग
ऐसा ही है।
निष्कर्ष:-
आदिम
जनजाजि कमार के
विकास में शासकीय
विकास योजनाओं
के भूमिका संबंधी
अध्ययन में प्राप्त
तथ्यों के विशलेशण
के आधार निश्कर्शतः
यह कहा जा सकता
है कि कमार लोगों
के पारिवारिक विवरण
अन्तर्गत अधिकांश
उत्तरदाताओं के
स्वयं का आवाश
है तथा 33.1 प्रतिशत
उत्तरदाताओं को
शासन के इंदिरा
आवास योजना का
लाभ मिला है जिसमें
6.2 प्रतिशत
उत्तरदाताओं का
इंदिरा आवास अर्धपक्का
है जो योजना में
क्रियान्वित शासकीय
विफलता की ओर इसारा
करती है।
कमार
परिवार 36.9 प्रतिशत
परिवार बडे आकार
का परिवार है जहां
10 से अधिक
परिवारिक सदस्या
है जिससे इन परिवार
को पारिवारिक आवश्यकताओं
को पूरा करने में
कई समस्याओं का
सामना कर रहीं
है। उत्तरदाताओं
के शिक्षा का स्तर
में केवल 9.2 प्रतिशत
हाईस्कूल एवं हायर
सेकण्डरी स्तर
की शिक्षा तक पहुंचे
है जो कमार जानजाति
लोगों में शिक्षा
का निम्न स्तर
तथा बीच के स्कूल
छोडने की अधिक
दर को बतलाती है।
कमार
परिवार व्यवसाय
के दृृश्टि से
आज भी परम्परागत
साधनों पर आजीविका
कार रही है, इनके मासिक
आय में केवल 5.4 प्रतिशत
उत्तरदाताओं का
4000 रूपये
से अधिक है जो इनके
आर्थिक तंगी और
विकास योजनाओं
के लाभ और विफलता
को प्रदर्शिक करता
है। परिवारिक आवश्यकताओं
के भौतिक सुविधाओं
में घरेलू बर्तन
लगभग सभी परिवार
में है फाईबा कुर्सी
22 परिवार
में, टेलीविजन
06 परिवार
में,मोबाईल
17 परिवार
में, मोटर बाईक
04 परिवार
में उपलब्ध है
यह तथ्य कमार परिवार
में धीमी परिवर्तन
को दर्शाती है।
शासकीय
योजनाओं के लाभ
लेने में 33.1 प्रतिशत
परिवार को इंदिरा
आवास योजना का
लाभ मिला है। शिक्षा
योजना में 66.2 प्रतिशत
उत्तरदाताओं के
परिवार को योजना
का लाभ मिला है
किन्तु शिक्षा
से कुछ ही परिवार
के आर्थिक और सामाजिक
स्थिति परिवर्तिक
करने में सफल हुई
है शेष परिवार
में किसी तरह का
परिवर्तन दिखलायी
नहीं पडता है।
स्वास्थ्य के प्रति
इनका दृृश्टिकोण
आज भी परम्परागत
बनी हुई है यह परिवार
उपचार के लिए स्वयं
जाने का प्रयास
नहीं करती है स्थिति
बहुत खराब होने
पर सरपंच व अन्य
किसी जानकारी मिलने
पर स्वास्थ्य केन्द्र
पहुंच पाते है।
भूमि सुधार योजना
का लाभ 37 परिवार को
मिला है। पशु पालन
योजना कारगर हो
सकती है और 67.6 प्रतिशत
परिवार को योजना
का लाभ भी मिला
किन्तु केवल 01 नग बकरी
उपलब्ध कराया गया
जिससे दूरगामी
परिणाम नगन्य रहीं।
वन भूमि पट््टा
योजना का लाभ 17 परिवार
को मिला परन्तु
यह भूमि पूरी तरह
से जंगलो से घीरे
है जिससे इनके
आर्थिक स्थिति
में कोई खास परिवर्तन
नहीं कर पाई है।
उपरोक्त
निष्कर्षों से
ज्ञात होता है
कि कमार परिवार
के लोगों के सामाजिक-आर्थिक
स्थिति में शासन
के निरन्तर योजनाओं
के क्रियान्वयन
के उपरांत भी किसी
तरह के बडे परिवर्तन
और आत्मनिर्भता
लाने में पूरी
तरह विफल रही है
कमार परिवार प्रधानमंत्री
एवं मुख्यमंत्री
खद्यान योजना से
प्राप्त चावल, नमक, चना से केवल
जीवन की निरन्ता
को बनाये रखी है
अन्यथा जितने भी
योजनाएं कियान्वित
किया गया उससे
इनके जीवन में
जीवन के उद्वेश्य
तक को स्थापित
करने में विफल
दिखायी पडता है।
कमार लोगों के
विकास में
निम्न
सुझाव करगर सिद्व
हो सकते है-
1. योजना
ऐसे हो जिससे इन्हें
गांव में ही सामाजिक-आर्थिक
परिवर्तन लाने
में कारगर हो जैसे-
पशु पालन योजना
इस योजना अन्तर्गत
इन्हें एक परिवार
को कम से कम 8-10 नग बकरी
उपलब्ध कराया जाय
और यह बकरी का समय-समय
पर पशु चिकित्सक
द्वारा जांच हो
यदि इतने बकरी
को 3 वर्श
तक सुरक्षित देखभा
किया जाता है तो
तसरा वर्श में
हितग्राही के पास
60 बकरी
होगी इसमें कम
से कम 10 बकरा
होगा जिसे बेचने
पर 60,000 रूपये
प्राप्त हो सकता
है इस प्रकार कमार
परिवार आर्थिक
रूप से आत्म निर्भर
हो सकेगा।
2. कमार
परिवार द्वारा
निर्मित बांस का
टोकनी,
सूपा
और अन्य वस्तुओं
के बेचने के लिए
बाजार की व्यवस्था
की जाये यह बाजार
व्यवस्था ठीक वैसे
ही किया जाये जैसे
भारता में चीन
के द्वारा निर्मित
वस्तुए बेचा जा
रहा है।
3. कोई योजना
ऐसे निर्मित नहीं
किया जाये जिससे
छणिक लाभ अथव केवल
जीवित रहने के
लिए हो वर्तमान
में ऐसे कई योजनाएं
संचालित है इससे
व्यक्ति पंगू हो
जाता है और मेहनत
करना नहीं चाहता
है। अतः योजना
पूरे जीवन को लम्बे
समय तक लाभान्वित
कर सके ।
सरकार
इस तरह के योजनाओं
का निमार्ण कर
क्रियान्वित करे
तो निश्चित आदित
जनजाति कमार सामाजिक-आर्थिक
स्थिति आत्मनिर्भता
बनाया जा सकता
है बल्कि ऐसे योजनाओं
देश के ग्रामीण
जीवन को भी बदला
जा सकता है।
REFERANCE:
1- 1. Mohanty, P.K.,
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Kalpaz Publiation , Delhi, 2004, p.227-228
2- Risley, H.H.,The People
of India, Colcutta,19o8 (App.XII)
3- Dube, Leela & S.C.
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No.2, 1948, p.104.
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religion and ritual of the Kamar, Eastern Anthropology, Vol.1, No.1, 1947, pp.27-42.
5- Russell, R.V.&Hira
Lal, The Tribes and Castes of the Central Provinces of India, Vol.III, London,
1916,p323-325.
6- रंजन, रितेश
एवं विनय कुमार, हजारीबाग
जिले के मुण्डा
जनजाति की सामाजिक
आर्थिक स्थिति
द्वारा एसण्एनण्चैधरी
एवं सहयोगी, आदिवासी
विकास उपलब्धियां
एवं चुनौतियां
भाग.1, 2012, पृण्209
7- Palta, Aruna, Bulletin
of Tribal Research Institute, Bhopal, Vol. XXIII, Dec. 1995, No.12, p.61
8- निस्तार
कुजूर, आदिम
जनजाति कोरवा, सिंघाई
पब्लिशर्स एण्ड
डिस्ट््र्रीब्यूटर्स, रायपुर, 2011, पृ.84.85
9- द्विवेदी
बी.के. एवं सहयोगी, आदिवासी
महिला रोजगार में
का्रतिकारी कदम, कुरूक्षेत्र, अंक 9, जुलाई
2006, पृ. 38
10- व्यास, नरेन्द्र., आदिवासी
समाज एवं उत्थानः
प्रकाश चन्द्र
मेहता, आदिवासी
विकास एवं प्रथाएं, डिस्कवरी
पब्लिशिंग हाउुस, नई दिल्ली, 2006, पृृ.71.
11- मेनन, पी.एस.के., जनजाति
विकास, नीतियां, योजनाएं
और कार्यक्रम, याजना, अंक.3, जून 2000, पृृ.32.